धर्म और शत्रुबोध (एक आध्यात्मिक विश्लेषण )
धर्म और शत्रुबोध
मेरा मानना है कि किसी व्यक्ति अथवा समाज में “शत्रु बोध” का विचार उसके भीतर छिपे अप्रकट भय की सूचना है। जब एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को (पक्ष और प्रति पक्ष समान रूप से) शत्रु के रूप में देखता है, तो वस्तुतः उनका मन किसी अदृश्य आशंका या असुरक्षा से भयभीत होता है।
जबकि हम देखते हैं कि सभी धर्मों में स्वर्ग की संस्तुति की गई है, जिसे समझने में मानव मन सदा से असमर्थ रहा है।यदि हमें समझना हो कि स्वर्ग क्या होगा, तो आप कहेंगे कि वहाँ ऐश्वर्य होगा — अर्थात सब कुछ होगा।
पर मैं आपसे पूछूँ कि स्वर्ग में क्या नहीं होगा?
तो उत्तर होगा — वहाँ भय नहीं होगा।
मैं मानव को तीन स्तरों में बाँटकर देखता हूँ —
पहला — आदम।
आदम वह है जो स्वयं को किसी दूसरे से नहीं, केवल स्थूल शरीर तक ही जानता है। जिसका परिचय स्वयं के शरीर से ही है। कह सकते हैं कि इस वर्ग में गुलाम या दास लोग आते हैं।
दूसरा — व्यक्ति।
व्यक्ति वह है जो मन के स्तर पर जीता है और अपने को हमेशा अभिव्यक्त करता रहता है। यह घड़ी के पेंडुलम के समान अस्थिर स्वभाव का होता है। इसमें “मैं” भाव का अतिरेक होता है — “मैं यह हूँ, मैं यह कर दूँगा, मैंने इतना किया” इत्यादि।
तीसरा — मनुष्य।
मनुष्य वह है जिसने अपने भीतर ईश्वरीय तत्व को जाना, जिसने स्वयं के अमृत रूप को पहचाना, जिसने अपने सनातन स्वरूप को जाना। इसमें केवल आत्मज्ञानी पुरुष ही आते हैं — जिन्होंने अपने भीतर सत्-चित्-आनंद का अनुभव किया है।
भय से मुक्त भाव ही तो आनन्द है जो स्वर्ग का वास्तविक चित्रण है। भय कब नहीं होगा? जब विचार नहीं होगा।
और जब विचार नहीं होगा, तो दुःख भी नहीं होगा।
धर्म विज्ञान है भय से मुक्ति का, जो उस रहस्य को जानने के लिए व्यक्ति को मौन तक ले जाता है
क्या कारण है कि मुहम्मद साहब ने कुरान में कहा है कि “जो ईमान लाया, उसे भय और दुःख नहीं होगा।”
गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं —
गीताशास्त्रमिदं पुण्यं यः पठेत् प्रयतः पुमान्।
विष्णोः पदम् अवाप्नोति भयशोकादिवर्जितः॥
भय शोक आदि से मुक्त होकर विष्णु पद को प्राप्त करता है।
ये जन्नत, स्वर्ग या विष्णुपद आदि सब उस परम अवस्था की सूचना हैं, जिसे आत्मज्ञानियों ने अपने जीवन के अनुसंधान से जाना है।
अनादि काल से सभी आत्मज्ञानियों का प्रयास रहा है कि समस्त मानव इस रहस्य को जाने, जिसके लिए उन्होंने एक मत से धर्म को एकमात्र विज्ञान के रूप में अपनाने की संस्तुति की।
हम सभी को समान रूप से यह बताया गया है कि सभी धर्म एक हैं, लेकिन किसी ने प्रवेशिका (प्राथमिक) स्तर पर नहीं बताया कि वे कैसे एक हैं। हमें परम के आधार पर समझाया गया कि सभी धर्म एक हैं क्योंकि सभी धर्मों में अल्लाह, गॉड और ईश्वर को समान आधार दिया गया है।
जबकि आवश्यकता है धर्म को प्राथमिक स्तर पर समझने की, जिसे मैंने अपनी पुस्तकों में स्पष्ट करने का प्रयास किया है — जिसके लिए मैंने इस्लाम धर्म को विशेष रूप से रखा है।
अधिक जानने के लिए पढ़ें —
“इस्लाम : समाधान या समस्या”
और
“धर्म, आत्मा और ईश्वर”
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