Eman: The Second Element of Science of Religion
ईमान : धर्म-विज्ञान का दूसरा घटक
साथियों,
जैसा कि हमने धर्म-विज्ञान के प्रथम घटक इस्लाम के बारे में बात की, जिसमें यह बताया गया कि इस्लाम का अर्थ आत्मसंवाद है, जो अल्लाह अर्थात ईश्वर-तत्व को जानने का प्रथम पड़ाव है। ऐसा मेरा विश्वास है कि यह बात आपको सरलता से समझ आ गई होगी।
अब हम उसी से आगे बढ़ते हुए आज धर्म-विज्ञान के दूसरे महत्वपूर्ण घटक के बारे में बात करेंगे, जो है “ईमान”। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि मुहम्मद साहब ने इस्लाम स्वीकार करने वालों, अर्थात मूमिनों, से ही ईमान लाने के लिए कहा।
इस्लाम में शब्द मूमिन के लिए हिंदू धर्म में मुमुक्षु शब्द का प्रयोग किया जाता है, जो समान रूप से सत्य के खोजी के लिए प्रयुक्त होता है जैसा कि मैं मुहम्मद साहब को एक आत्मज्ञानी महापुरुष के रूप में देखता हूँ, जिनकी पूरी शिक्षा इस्लाम से इल्हाम की है। इल्हाम अर्थात आत्मज्ञान—जिसका अर्थ है आत्म-तत्व का ज्ञान—जिसे उन्होंने अल्लाह के मार्ग के रूप में लोगों के सामने रखा।
इसे मैं ईश्वर को जानने का विज्ञान कहता हूँ, जिसे हिंदुओं ने धर्म कहा है और मुहम्मद साहब ने इसे दीन कहा। दीन अर्थात ईश्वर को जानने का विज्ञान, या अल्लाह के मार्ग पर चलना—अर्थात उसका पालन करना। अल्लाह के मार्ग पर चलने का सीधा और स्पष्ट अर्थ है वह मार्ग, जिसकी मंज़िल अल्लाह हो। इसी को हिंदू धर्म में योग कहा गया है, जिसका अर्थ है ईश्वर-तत्व से जुड़ना।
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि मुहम्मद साहब सहित सभी आत्मज्ञानी महापुरुषों ने सांसारिक जीवन को गफलत और नींद बताया है तथा जीवन में गाफिल न होने की बात कही है।
साथियों, गफलत का अर्थ है बेहोशी। बेहोशी से होश का दामन पकड़कर ही पार पाया जा सकता है। यही कारण है कि मुहम्मद साहब ने ईमान, अर्थात होश, लाने की बात कही, जो ईश्वर-तत्व से जुड़ने का एकमात्र उपाय है।
साथियों, आपको यह भी पता होना चाहिए कि किसी व्यक्ति में होश की पराकाष्ठा ही ईश्वर-तत्व का ज्ञान बनती है। इसलिए यदि हम बुद्ध, ओशो या जिद्दू कृष्णमूर्ति को पढ़ते हैं, तो उनका जोर जीवन के प्रति होश लाने पर ही है, जिसे उन्होंने अवेयरनेस कहा। बुद्ध की शिक्षाओं में इसे बोध कहा गया है।
ईमान से ही ईमानदार शब्द निकलता है। यदि हम ईमान शब्द का गहराई से अवलोकन करें, तो जानेंगे कि यह होश के लिए ही प्रयोग किया गया है। क्योंकि साथियों, होश के आने से ही हमें मन की इच्छाओं, आसक्तियों और वासनाओं के बंधनों का बोध होता है, जो हमें इनसे मुक्त होने में सहयोगी होता है।
बेहोशी में यही वासनाएँ आभूषण-सी दिखाई पड़ती हैं, क्योंकि व्यक्ति का मन वासना-रहित और वासना-सहित दोनों अनुभवों को जानता है। वह यह भी जानता है कि सभी वासनाएँ भय से पैदा होती हैं और भय में ही दुबकी रहती हैं, जो व्यक्ति की बेचैनी का कारण बनती हैं। इसलिए इस्लाम अर्थात आत्मसंवाद अपनाने वाला मूमिन सुकून को ही चुनता है।
इसी संदर्भ में नचिकेता की कहानी अवश्य पढ़नी चाहिए, जिसने मृत्यु के देवता यमराज के वासना-जाल को अपने विवेक से काटकर सत्य को जानने के पथ पर आगे बढ़ने का साहस किया। गौरतलब है कि मुहम्मद साहब ने विवेक को ही फ़रिश्ता कहा है, जो हमें कुमार्ग पर जाने से रोकता है और सही रास्ते पर चलाता है।
आनंद, जो किसी भी मनुष्य का वास्तविक स्वभाव है, उसे साधक एक ठहराव के रूप में अनुभव करता है, जो होश की अकंप अनुभूति है। यही कारण है कि इस अवस्था को मुहम्मद साहब ने मुस्लिम, अर्थात स्थिर होश वाला, बताया है। इसी को श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ कहते हैं, बौद्ध दर्शन इसे द्रष्टा कहता है और सनातन धर्म में इसे साक्षी कहा गया है।
ईश्वर के लिए कहा जाता है कि वह साक्षी-स्वरूप है। यही वह अवस्था है जिसे हिंदुओं ने सत्-चित्-आनंद कहा है। इसी के आधार पर इस्लाम को शांति का मार्ग या शांति का धर्म कहा जाता है।
तो साथियों, इस विषय में आपका क्या मानना है—कमेंट में अवश्य बताइए।
मिलते हैं धर्म-विज्ञान के अगले घटक क़ुरआन के साथ।