बृहदारण्यक उपनिषद, अद्वैत वेदांत और इस्लामिक दर्शन
नमस्कार दोस्तों!
एक video देखते हुए विचार हुआ कि इस्लाम को मानने वाले
अक्सर उन सभी बातो को नकारते है।
जिसे हिन्दू धरम को मानने वाले सहज रूप में अपना लेते है।
दोस्तों बात है वन्दे मातरम को लेकर
जो गलियों से लेकर भारतीय संसद तक में चर्चा का विषय बना हुआ है।
आज हम इसी संवेदनशील विषय पर बात करने जा रहे हैं,
जिस पर सामान्यतः खुलकर चर्चा नहीं की जाती।
आज हम इसके पीछे छिपे राज को धरम की रोशनी में समझने का प्रयास करेंगे।
मै आपका दोस्त स्वामी अनंत मैत्रेय जोकि मेरा संन्यास का नाम है।
संन्यास, धर्म की यात्रा का प्रथम आवश्यक चरण है।
जहा हमें गुरु द्वारा एक नया नाम दिया जाता है जो जीवन की नयी शुरुवात जैसा होता है जहा से हम जीवन की वास्तविकता को जानने के लिए गुरु के सानिध्य में जीवन के एक नये आयाम में प्रवेश करते है इस्लाम में संन्यास की इसी व्यवस्था को दावत ऐ दीन कहा जाता है ।
हम इस बात को धयान में रखेंगे कि धर्म हमारी स्वयं की समझ को विकसित करने का एक विज्ञान है। जो हमारी मिथ्या धारणाओं से मुक्तकर हमे अहंकारके झूठे माया जाल से बचाता है। जिसके परिणाम स्वरुप हमे जीवन की बहुमूल्य वास्तविकता का बोध होता है। जिसे जानने वालो ने ईश्वर कहा है ईश्वर का अर्थ है, जो नश्वरता से मुक्त है। जीवन की इसी बहुमूल्य वास्तविकता को जानने के दो मार्ग है। एक स्वीकार साधना पद्धति और दूसरा है नकार पद्धति
इस्लामिक साधना पद्धति का गहरा और प्रत्यक्ष संबंध नकार से है,जिसे उपनिषद और अद्वैत वेदांत में “नेति–नेति” कहा गया है। यह एक सहज यात्रा पथ है जो संसार के नश्वर स्वभाव को समझ कर हमें अपने भीतर उतरने में सहायक होती है।
नेति–नेति का सिद्धांत क्या है?
“नेति–नेति” का अर्थ है — न यह, न यह ।
यह एक प्राचीन और अत्यंत गहन साधना-पद्धति है,
जो स्पष्ट रूप से कहती है कि
ईश्वर-तत्व यानि सत्य को किसी भी नाम, रूप, गुण, अनुभव या वस्तु से परिभाषित नहीं किया जा सकता।
- जो कुछ हम देखते हैं, सुनते हैं या अनुभव करते हैं —
वह अंतिम सत्य नहीं है। - नेति–नेति का मूल उद्देश्य है:
देह, मन और संसारिक आसक्तियों का निषेध करते हुए शुद्ध चेतना यानि आत्म-तत्व तक पहुँचना।
यही वह मार्ग है,
जो अंतत: वास्तविक ईश्वरीय ज्ञान बनता है।
उपनिषद और अद्वैत वेदांत में संदर्भ
बृहदारण्यक उपनिषद में कहा गया है:
“यो नान्तः प्रज्ञः स आत्मा”
— जो अंततः जाना जाता है, वही आत्मा है।
यहाँ साधक को गुरु को स्पष्ट निर्देश होता है कि:
जो दिखाई देता है, वह आत्मा नहीं है।केवल साक्षी-चेतना ही सत्य है।
अद्वैत वेदांत में भी यही मूल सिद्धांत है—
एक ऐसी साधना,
जो गुरुओं के सानिध्य में साधक को द्वैत से मुक्त कर आत्म-ज्ञान तक पहुँचाती है।
इस्लामिक दर्शन में नेति–नेति सिद्धांत की पुष्टि
अब प्रश्न उठता है —
क्या इस्लामिक साधना का संबंध नेति–नेति से है?
क़ुरआन की अनेक आयतें इस प्रश्न का उत्तर स्वयं देती हैं।
- “लैसा कमिस्लिही शै’उन”
— नहीं कुछ भी, उसके जैसा (42:11) - “ला इलाहा इल्लल्लाह”
—नहीं पूज्य, कोई सिवाय अल्लाह के (47:19) - “कुल्लु मन् अलाईहा फान”
— जो कुछ धरती पर है, नश्वर है (55:26) - “वयब्का वज्हु रब्बिका”
— केवल रब का अस्तित्व शेष रहेगा (55:27) - “ला तुद्रिकुहुल अब्सार”
— नहीं पकड़ सकतीं आँखें उसे (6:103)
इन आयतों में नकार (निषेध) का लगातार प्रयोग यह दर्शाता है कि
इस्लामिक साधना भी उसी नेति–नेति सिद्धांत का अनुसरण करती है,
इस्लामिक अवधारणाओं में
- इब्राहीम और मुहम्मद साहब आदि नबियों द्वारा बुत को तोड़ना।
- प्रकृति या बहुरूपी ईश्वर को मानने वालों को काफ़िर कहना।
- मूर्ति-पूजा करने करने वालो को मुशरिक बतलाना ।
उपरोक्त सभी तथ्य मेरे इस विचार को और अधिक पुष्ट करते हैं ।
जहाँ संसारिक अनुभवों का नकार करके
ईश्वर को अपरिभाषेय और निराकार माना गया है।
आज का सामाजिक संदर्भ — विकृति का संकेत
लेकिन जब हम आज के सामाजिक व्यवहार को देखते हैं,
तो एक गंभीर प्रश्न सामने आता है।
- भारत माता की जय बोलने से इंकार।
- वन्दे मातरम् को स्वीकार न करना।
- संगीत के प्रति नफरती भाव अपनाना ।
- प्रकृति के प्रति कृत्घन भाव रखना।
- सामजिक स्तर पर दुसरे के त्योहारों के प्रति अलगाव रखना।
ये सभी व्यवहार संकेत देते हैं कि आज का इस्लाम नेति–नेति की गूढ़ साधना का केवल विकृत रूप बन रह गया है।
जिस साधना का उद्देश्य था —
स्वयं के भीतर उतरकर आत्मा और ईश्वर को जानना,
वही साधना आज
बाहरी व्यवहार, सामाजिक टकराव और वैमनस्यता के चक्र व्यूह में फंस कर रह गई है।
निष्कर्ष
तो दोस्तों, निष्कर्ष स्पष्ट है:
- नेति–नेति एक निर्णायक निषेधात्मक साधना है, जो गुरुजनों के मार्गदर्शन में सत्य, आत्मा और ईश्वर तक पहुँचाती है।
- बृहदारण्यक उपनिषद और अद्वैत वेदांत इसका शास्त्रीय आधार हैं।
- क़ुरआन की आयतें उसी दर्शन की दार्शनिक पुष्टि करती हैं।
- आज के सामाजिक व्यवहार यह दिखाते हैं कि इस्लाम की यह मूल साधना विकृत होकर केवल नियम और पहचान तक सिमट गई है।जिसका मूल कारण है अनुभवी गुरुजनो को नकारना।
सार्वभौमिक संदेश:
सभी धर्म और साधनाएँ —
उपनिषद हों, वेदांत हों या क़ुरआन —
आत्म/ईश्वर-ज्ञान की अभीप्सा को ही अपने केन्द्र में संजोये हुए हैं। जो मुलत : साधक को वासना मुक्ति के मार्ग पर चलकर प्राप्त होती है
दोस्तों, यही है दर्शन का सार —
और यही है वह सत्य,
जिस पर गंभीर मंथन आवश्यक है।
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धन्यवाद।