Islam: The Frist Element of Science of Religion
यदि प्रश्न हो कि इस्लाम में नैतिकता (Ethics) का मूल आधार क्या है,
तो इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि इस्लाम में नैतिकता का आधार पाकीज़गी, अर्थात जीवन को वासनाओं से मुक्त करना है।
जैसा कि हज़रत मुहम्मद साहब ने कहा है—
“जो लोग वासनाओं का अनुसरण करते हैं, वे अल्लाह के मार्ग से भटक जाते हैं।”
और क़ुरआन में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है—
“निजात, यानी सफलता, उसी को मिलेगी जिसने अपने नफ़्स को पाक किया।”
(सूरह अश-शम्स 91:9)
इस्लाम मनुष्य को आंतरिक और भौतिक—दोनों स्तरों पर पाकीज़गी अपनाने की शिक्षा देता है।
विचारों की पवित्रता, कर्मों की शुद्धता और नीयत की साफ़ी—यही इस्लामी नैतिक आचरण का मूल आधार है।
नफ़्स की पाकीज़गी के माध्यम से ही व्यक्ति ईश्वरत्व, अर्थात इलहाम की अवस्था को प्राप्त करता है।
इसके लिए धर्म एक विज्ञान की तरह सहयोग करता है, जिसके तीन प्रमुख घटक हैं—
इस्लाम, ईमान और क़ुरआन, जिन्हें हमें गहराई से समझना होगा।
इस्लाम में वासनाओं पर संयम और आत्मनियंत्रण की इस प्रक्रिया को तक़वा कहा जाता है,
और तक़वा ही इस्लामी नैतिकता की आत्मा है।
अब इसे थोड़ा और स्पष्ट रूप में समझते हैं—
पहला घटक: इस्लाम
इस्लाम, जो धर्म-विज्ञान का प्रथम घटक है, का हिंदी अर्थ यहाँ आत्मसंवाद है।
यह आत्मसंवाद हमें अपनी इच्छाओं, आसक्तियों और वासनाओं के प्रति सचेत करता है।
यदि इस्लाम में अनावश्यक प्रश्नों से रोका गया है, तो उसका कारण यही है कि धर्म एक अंतर्यात्रा है—
अर्थात अपनी नफ़्स में उतरने की यात्रा,
जो हमें वास्तविक सत्य का साक्षात्कार कराती है।
दूसरा घटक: ईमान
धर्म-विज्ञान का दूसरा घटक ईमान है।
मुहम्मद साहब ने इस्लाम स्वीकार करने वालों—अर्थात मूमिनों—से ही ईमान लाने के लिए कहा।
यदि प्रश्न उठे कि मूमिनों से ही ईमान लाने की बात क्यों कही गई,
तो इसे समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि
हिंदू परंपरा में मूमिन के लिए मुमुक्षु शब्द प्रयुक्त होता है—
अर्थात सत्य का खोजी।
मैं मुहम्मद साहब को एक आत्मज्ञानी महापुरुष के रूप में देखता हूँ,
जिनकी पूरी शिक्षा इस्लाम से इलहाम की है।
इलहाम का अर्थ है आत्मज्ञान—
अर्थात आत्म-तत्त्व का ज्ञान,
जिसे उन्होंने अल्लाह के मार्ग के रूप में मानवता के सामने रखा।
इसी को मैं ईश्वर-तत्त्व को जानने का विज्ञान कहता हूँ।
हिंदुओं ने इसे धर्म कहा,
और मुहम्मद साहब ने इसे दीन कहा।
दीन का अर्थ है—
अल्लाह के मार्ग पर चलना, अर्थात उसका पालन करना।
और हिंदू धर्म में इसी को योग कहा गया है,
जिसका अर्थ है ईश्वर-तत्त्व से जुड़ना।
सभी आत्मज्ञानी महापुरुषों ने सांसारिकता-ग्रस्त जीवन को
गफलत और नींद बताया है।
गफलत का अर्थ है—बेहोशी।
और जीवन की इस बेहोशी को केवल होश के द्वारा ही काटा जा सकता है।
इसी कारण मुहम्मद साहब ने ईमान, अर्थात होश, लाने की बात कही—
क्योंकि ईश्वर-तत्त्व से जुड़ने का यही एकमात्र उपाय है।
जब किसी व्यक्ति में होश अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचता है,
तो वही अवस्था ईश्वर-तत्त्व का ज्ञान बन जाती है।
बुद्ध, ओशो और जिद्दू कृष्णमूर्ति—
सभी ने जीवन के प्रति होश लाने पर ही ज़ोर दिया,
जिसे उन्होंने अवेयरनेस, बोध या साक्षीभाव कहा।
ईमान शब्द से ही ईमानदार शब्द निकला है।
ईमानदार वही होता है जो इच्छाओं, आसक्तियों और वासनाओं के जाल से मुक्त हो—
जिसके मन में अमानत में ख़यानत का विचार तक न आए।
यही अवस्था स्थिर बुद्धि की है।
इसी कारण श्रीकृष्ण ऐसे साधक को स्थितप्रज्ञ मुनि कहते हैं,
और हज़रत मुहम्मद साहब ऐसे मूमिन को मुसलमान कहते हैं—
जो चेतना का सर्वोच्च बिंदु है।
इस्लाम, अर्थात आत्मसंवाद, अपनाने वाला मूमिन
अपने मन की इच्छाओं और वासनाओं के बंधनों को पहचानता है।
इस यात्रा में होश एक रोशनी का काम करता है,
जो व्यक्ति को वासना-मुक्त होने में सहयोग करता है।
हिंदू धर्म में इसी होश को
ध्यान, प्रज्ञा, स्मृति, बोध, साक्षी, अवेयरनेस या माइंडफुलनेस कहा गया है।
हर वासना एक गुलामी है,
और हर मनुष्य स्वभाविक रूप में वासनाओं से स्वतंत्र होना चाहता है।
इसी संदर्भ में संतवाणी कहती है—
“चाह गई चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह।
जिसको कुछ नहीं चाहिए, वह सबसे बड़ा शहंशाह।”
यहाँ—
चाह का अर्थ है वासना,
बेपरवाह का अर्थ है स्वतंत्र,
और शहंशाह का अर्थ है सम्राटों का भी सम्राट।
बेहोशी की अवस्था में वासनाएँ आभूषण-सी प्रतीत होती हैं।
यदि गहराई से समझा जाए,
तो धर्म और अधर्म का अंतर केवल होश और बेहोशी का अंतर है।
इसी कारण मुहम्मद साहब ने वासनापूर्ण जीवन को गफलत कहा।
सभी वासनाएँ भय से उत्पन्न होती हैं
और भय में ही पनपती रहती हैं।
वे क्षणिक सुख का अनुभव तो कराती हैं,
पर वह सुख अस्थायी होता है।
क्योंकि मन वासना-रहित और वासना-सहित—
दोनों अवस्थाओं को जानता है।
इसलिए इस्लाम, अर्थात आत्मसंवाद अपनाने वाला मूमिन
अंततः सुकून को ही चुनता है।
अब बात करते हैं—
फ़रिश्ता बनाम विवेक की।
नचिकेता की कथा हमें सिखाती है कि
कैसे उसने वासना के जाल को
अपने विवेक से काटकर
परम सत्य की खोज का मार्ग चुना।
मुहम्मद साहब ने इसी विवेकशीलता को फ़रिश्ता कहा—
जो हमें कुमार्ग से रोकता है
और सही मार्ग पर ले जाता है।
सतत अभ्यास से साधक
होश की पूर्णता को एक ठहराव,
और होश की अकंप अनुभूति के रूप में अनुभव करता है।
यही वह अवस्था है जिसे बुद्ध ने द्रष्टा कहा,
और इसी कारण ईश्वर को साक्षी-स्वरूप कहा गया है।
यही अनुभूति हिंदू दर्शन में
सत्-चित्-आनंद कहलाती है।
और इसी आधार पर
इस्लाम को शांति का मार्ग,
अथवा शांति का धर्म कहा गया है। तो दोस्तों आपको मैंने बतलाया धरम के विज्ञान का दूसरा घटक ईमान है जिसे हमने होश कहा और बतलाया की धरम और अधर्म में केवल होश और बेहोशी का अंतर है होश संसारिकता के प्रति सचेत होकर विचार करता है बहोशी व्यसन वासनाओं के मार्ग पर ले जाती है इसलिए मुहम्मद साहब का यह कथन अत्यंत महत्वपूरण और विचारनीय है की जो लोग वासनाओं का अनुसरण करते हैं अल्लाह के मार्ग से भटक जाते है साथियों क्या कहना है आपका इस विषय में कोमेंट के माध्यम से अवश्य बतलाएं यदि आप मेरे इस चैनल पर नए हैं तो इसे सब्सक्राइब अवश्य करले धन्यवाद ।