Quran: The Third Element of Science of Religion

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Quran: The Third Element of Science of Religion

पिछले भाग में हमने यह जाना कि धर्म एक विज्ञान है, जो हमारी समझ को विकसित करता है और हमें ईश्वर-तत्त्व से जुड़ने में सहयोगी होता है। इसी मार्ग को मुहम्मद साहब ने अल्लाह के मार्ग के रूप में लोगों के सामने रखा।
आज हम धर्म-रूपी इस विज्ञान के तीसरे घटक — “क़ुरआन पर विचार करेंगे और यह जानने का प्रयास करेंगे कि क्यों?

  • यदि किसी डॉक्टर की दवा से किसी मरीज की मृत्यु हो जाए, तो क्या वह व्यक्ति और उसका समाज उस डॉक्टर से प्रश्न नहीं करेगा?
  • यदि किसी वैज्ञानिक के सिद्धांत या विचारधारा के नाम पर बार-बार मानवता को क्षति पहुँचती है, तो क्या उसके विचार, उनकी व्याख्या और उसके प्रयोगों पर प्रश्न उठाना अनुचित होगा? 

इसी प्रकार यदि हम इस तथ्य पर विचार करें कि इस्लाम से जुड़ी पहचान के साथ पत्थरबाज़ी और हिंसा की घटनाएँ प्रायः देखने को मिलती हैं— जैसे बांग्लादेश में दीपुचंद्र दास को जलाकर मारने की घटना, ऑस्ट्रेलिया के बॉन्डी बीच की घटना, पहलगाम (कश्मीर) की घटना, या सिख्खों पर हुए अत्याचार—तो यह स्पष्ट होता है कि इतिहास ऐसी असंख्य घटनाओं की श्रृंखला से भरा पड़ा है।

इन घटनाओं से यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होता है कि इन दुर्दांत कृत्यों का सतत रूप से घटित होना क्यों दिखाई देता है?
मुहम्मद साहब की शिक्षाओं का अनुसरण करने वालों द्वारा अंजाम दी जाने वाली ये घटनाएँ सीधे-सीधे मुहम्मद साहब की शिक्षाओं को ही प्रश्नों के घेरे में खड़ा करती हैं।

इससे मेरा मन इस बात पर विचार करता है कि —

  • या तो मुहम्मद साहब की शिक्षा में कोई मूल त्रुटि थी,
  • या फिर उनकी शिक्षाओं को प्रस्तुत करने में मोमिनों के साथ किसी प्रकार जालसाज़ी रची गई ।

क्योंकि धर्म किसी भी ऐसी हिंसा का समर्थन नहीं करता कि केवल रंग या पहचान देखकर यह कहा जाए कि एक रंग वाले सभी लोग तुम्हारे शत्रु हैं और उनका कत्ल कर दो।
हाँ, दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करना न्यायसंगत और बराबरी का सिद्धांत हो सकता है।

आज हम ऐसी घटनाओं के पीछे छिपे कारणों को खोजने का प्रयास करेंगे।

इसके लिए पहले हमें इस मूल प्रश्न में जाना होगा कि 

इस्लाम की मूल शिक्षा  क्या है?    

इस पर मेरी  समझ और दृष्टिकोण यह है कि इस्लाम, मानसिक स्तर पर पाकीज़ा होने की तैयारी है।
पाकीज़ा का अर्थ है—शुद्ध, निर्मल
जिसका मन निर्मल यानी मैल रहित होगा, वही पाकीज़ा होगा।
जिसके मन में मैल नहीं होगा, वही सुकून में रहेगा।
और जिसके मन में मैल होगा, वह भीतर ही भीतर जलता रहेगा—ऐसे कुछ लोगों को हम अपने आसपास अक्सर देखते ही हैं।

यहाँ मेरे पूछने का आशय यह है कि इस्लाम में पाकीज़गी, अर्थात निर्मलता, प्राप्त करने की वह विधि कौन सी है और क्या है जिससे हमारा मन पाकीज़ा हो जाएअर्थात हमारी नफ्स (चित्त) निर्मल हो जाए और हम सुकून के सागर में गोते लगा सकें।
यही अर्थ मुहम्मद साहब का भी रहा होगा, जिसके कारण इस्लाम को शांति का मार्ग कहा जाता है।

अब यदि हम थोड़ी देर के लिए धर्म को अलग रखकर हिंसा के कारणों पर सामान्य और वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करें, तो यह स्पष्ट होता है कि इसके संभावित कारण हो सकते हैं—

  1. जैविक (Biological)
  2. मनोवैज्ञानिक (Psychological)
  3. तंत्रिका-विज्ञान (Neuroscience)
  4. सामाजिक (Sociological)
  5. विकासवादी (Evolutionary) मानसिकता

यदि इन सभी कारणों को ध्यान में रखकर बारीकी से देखा जाए तो, ये दर्शातें है कि  हिंसा और उग्रता के पीछे मूल कारण अपने मन की इच्छाओं को अनुकूल रूप से पूरा न कर पाने का परिणाम—Frustration (कुंठा)—दिखाई देता है, जो मनुष्य को हिंसा की ओर धकेल देता है जिसके बाद व्यक्ति के पास पछतावे और ग्लानि के अतिरिक्त कुछ नहीं बचता। इसी बात को ओशो रजनीश ने मेरे बावजूद हो गया के भाव से अत्यंत स्पष्ट रूप में समझाया है।
जब इच्छा बार-बार बाधित होती है → उससे कुंठा उत्पन्न होती है → और यदि अनुकूल मार्ग न मिले → तो आक्रामकता पैदा होती है, जो अंततः हिंसा के रूप में प्रदर्शित होती है।

हम अकसर इसका उदाहरण छोटे बच्चों के व्यवहार में भी देखते हैं—आजकल यह प्रवृत्ति और अधिक बढ़ गई है।

  • कुंठित मन से ग्रषित बच्चे महँगा-सस्ता नहीं देखते और मोबाइल आदि को जमीन पर पटक देते हैं।
  • कुछ मामलों में कुंठित मानसिकता के कारण बच्चों द्वारा हत्या जैसी घटनाएँ भी सामने आई हैं।

अब प्रश्न यह है कि धर्म इस तथ्य को किस प्रकार देखता है? इसके पीछे का दार्शनिक दृष्टि क्या है

इसके पीछे का दार्शनिक सार यह है कि—

इच्छा स्वयं समस्या नहीं है; इच्छा के प्रति आसक्ति (Attachment) का भाव  ही वासना बनती है, जिसके पूर्ण न होने पर मनुष्य विवेकहीन हो जाता है,
और जिसके कारण से हिंसात्मक कृत्य फलीभूत होते हैं।

इच्छा के प्रति आसक्ति (Attachment) का भाव को ही—

  • बुद्ध ने तृष्णा कहा
  • आधुनिक मनोविज्ञान ने Unregulated Desire
  • गीता में श्रीकृष्ण ने कामक्रोधलोभमोहअहंकारभय के चक्र के रूप में समझाया
  • मुहम्मद साहब ने इसे हवा अर्थात वासना कहा

जिन्होंने भी धर्म को जाना, उनको ही आत्मज्ञान के बाद ही धर्म की वास्तविकता का ज्ञान हुआ
यही कारण है कि सभी धर्मों की नींव उन आत्मज्ञानी महापुरुषों पर टिकी है जिन्होंने स्वयं को जाना।
और सभी ने समान रूप से मन की वासना से मुक्ति को ही धर्म का मूल लक्ष्य बताया।

इसी सन्दर्भ में मुहम्मद साहब का कथन है कि—

जो लोग वासनाओं का अनुसरण करते हैं, वे अल्लाह के मार्ग से भटक जाते हैं।

और उनका दूसरा कथन है कि—

निजात उसे ही मिलेगी जिसने अपनी नफ्स को पाक किया।

मेरे मत में मुहम्मद साहब के ये दोनों वक्तव्य उन्हें आत्मज्ञानी महापुरुष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं।

  • अब यदि हम धर्म के नाम पर पत्थरबाज़ी और हिंसा को अंजाम देने वालों, तथा उसका समर्थन करने वालों का अवलोकन करें, तो हम पाते हैं कि उनमें कुंठा, हिंसक उन्माद और उग्रता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
    जो कुछ लोगों में, विशेषकर भीड़ की स्थिति में, यह उग्रता एक बिंदु के बाद नियंत्रण से बाहर हो जाती है और सामाजिक या व्यक्तिगत हिंसा के रूप में प्रकट होती है।

इसके पीछे मुख्य कारण यही  है कि धर्म को उसके सही अर्थों में नहीं समझा गया। परिणामस्वरूप धर्म की वास्तविकता खो गई और धर्मग्रंथ को ही संपूर्ण मार्गदर्शन मान लेने की भूल हुई।

अब प्रश्न यह है कि धर्म में वह कौन-सी विधि है जो हमारी नफ्स को पाकीज़ा बनाती है?

यदि इस्लाम की बात करूँ, तो वह विधि ही “क़ुरआन है, जो मुहम्मद साहब को होने वाले इल्हाम में सहायक बनी जिसके बाद उन्होंने स्पष्ट और पुख्ता रूप से बताया कि “क़ुरआन ही सच्चा और सही मार्गदर्शन  है, जिसे मैं धर्म-रूपी विज्ञान का तीसरा मुख्य घटक मानता हूँ।

मुहम्मद साहब ने क़ुरआन की पहचान के रूप में तीन मुख्य बातें बताईं—

  1. क़ुरआन पाक है
  2. वह कभी न बदलने वाला है
  3. क़ुरआन सबसे अच्छी दवा है

यदि हम इसे देखें, तो ये तीनों बातें हमारी “श्वास पर खरी उतरती हैं जिसका वैज्ञानिक रूप से अवलोकन करना व्यक्ति को मानसिक रूप से स्वस्थ बनता है और यह एक वैज्ञानिक तथ्य भी है।   
इसी श्वास के उपयोग को महर्षि पतंजलि ने प्राणायाम के रूप में साधकों को चित्त अर्थात नफ्स को निर्मल (पाक) करने के लिए सुझाया।

यदि हम बौद्ध धर्म का अवलोकन करें, तो बुद्ध ने तृष्णा से मुक्ति के लिए अनापान साधना बताई, जिसमें साधक श्वास के आने-जाने को सजगता से देखता है।
इस अभ्यास से साधक वासनाओं से मुक्त होता है और उसके जीवन में धैर्य आता है और यही सार अन्य सभी धर्मों में भी दिखाई देता है।

यदि हम क़ुरआन पुस्तक को शिक्षाओं के स्तर पर  देखें तो —
क़ुरआन पुस्तक में  शिक्षाओं का एक स्तर वह है, जिसमें मुहम्मद साहब की मूल धार्मिक शिक्षाओं पर आधारित इल्हाम यानी आत्मज्ञान(Enlightenment) की  प्रेरणा है, जिसके कारण मैं, मुहम्मद साहब को आत्मज्ञानी महापुरुष और पथप्रदर्शक मानता हूँ;
मेरा मानना है कि क़ुरआन पुस्तक में  शिक्षाओं का दूसरा स्तर वह है, जिसे संकलन कर्ताओं ने एक साम्राज्यवादी सोच के अनुरूप तथ्यों को हिंसा के लिए उकसाने के रूप में जोड़ा गया और और जिन्होंने इसे एक मुकम्मल किताब के रूप में लोगो के समक्ष प्रस्तुत किया गया।   

यदि हम शिक्षाओं के पहले स्तर के साथ चलते हैं, तो यह हमें गीता के समान ही आत्मज्ञान (Enlightenment) की ओर प्रेरित करती है।
यदि हम शिक्षाओं के दूसरे स्तर के साथ जाते हैं, तो यह हमें पुनः संसार की तृष्णा में धकेल देता है

जिससे बचने के लिये मुहम्मद साहब ने स्पष्ट रूपसे मुमिनो से  कहा कि “शैतान (यानि वासनायुक्त मन) को अपना संरक्षक मित्र मत बनाओ।”  

यदि हम मुहम्मद साहब के इस कथन पर ध्यान दें कि “अल्लाह निरपेक्ष है”
अर्थात तटस्थ, अपेक्षा-रहित और वासना-मुक्त—
जो न पक्ष में है, न विपक्ष में—
तो फिर यह कहना कि अल्लाह जो पूरी कायनात का पालनहार है  केवल उसे  मानने वालो को सफलता दिलाएगा और ना मानने वालो को हार का मुँह दिखाएगा, यह केवल एक अज्ञानतापूर्ण मान्यता है जिस पर विचार करना अत्यंत आवश्यक है।

यदि आप मेरे इस दृष्टिकोण से सहमत हैं और धर्म की बारीक बातों को और गहराई से समझना चाहते हैं, तो मैं आपको अपनी वेबसाइट anantmaitreyvision.com पर मिलने के लिए आमंत्रित करता हूँ।

नए साल, नए सवेरे के साथ हार्दिक शुभकामनाएँ।
धन्यवाद।

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