क्या मुहम्मद एक रसूल हैं ?
धर्म क्या है और इसकी क्या आवश्यकता है?
इसी विषय पर मैं अपना मंथन आपके साथ साझा करना चाहता हूँ।
इस मंथन का मूल उद्देश्य है —
मानव समाजों में धर्म-आधारित समरसता के ह्रास के कारणों एवं उनके निराकरण पर विचार करना।
जिसके लिए मैंने मुहम्मद साहब और उनके बतलाए धर्म इस्लाम को चुना है।
चूँकि धर्म के आधार पर इस्लाम को मानने वाले, मुहम्मद साहब को एक रसूल — अर्थात अल्लाह का संदेशवाहक — मानते हैं,
और उनकी शिक्षाओं पर आधारित पुस्तक कुरान को धार्मिक शिक्षा-प्रणाली के रूप में अपनाते हैं।
मेरा मानना है कि धर्म परोपकार का बीज है,
जो किसी व्यक्ति में फलित होने पर परोपकार के फल देता है।
इसी कसौटी पर यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है —
क्या मुहम्मद वास्तव में एक रसूल हैं?
🎧 इस्लामिक जीवनशैली और उसका प्रभाव
मेरा मानना है कि इस्लामिक जीवनशैली और उसमें प्रयुक्त मुहम्मद साहब की धार्मिक यात्रा से प्रेरित शब्दावली पूर्णतः इल्हाम — अर्थात आत्मज्ञान — की ओर संकेत करती है।
इस्लामिक विचारधारा से प्रेरित अलगाववादी घटनाओं में,
शायद मुझे आज भारत और पाकिस्तान के विभाजन तथा
कश्मीर के अलगाव-पीड़ित हिन्दू पंडितों के विस्थापन जैसी घटनाओं को याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है।
ये परिणाम मूलतः इस्लामिक शिक्षाओं पर आधारित हैं,
जिनका मूल उद्गम पुस्तक कुरान है।
कुरान को पढ़ने के परिणामस्वरूप
हिन्दू-मुस्लिम सांप्रदायिक दंगों और नरसंहारों की घटनाएँ देखने को मिलती हैं,
आज भी इस्लामिक समुदाय में वही अलगाव की प्रवृत्ति निरंतर बढ़ रही है,
जो वैश्विक स्तर पर भी स्पष्ट दिखाई देती है।
यही कारण है कि इस्लामिक संस्कृति का यह अलगाववादी रुख,
मुहम्मद साहब के रसूल होने पर प्रश्न खड़ा करता है।
🎧 वर्तमान परिप्रेक्ष्य और इस्लाम
आज की वास्तविकता यह है कि
इस्लाम के अनुयायी, मुहम्मद साहब की शिक्षाओं को अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर रहे हैं,
और ‘जिहाद’ को स्वर्ग प्राप्ति का एक साधन बताकर
छोटे छोटे बच्चों में यह सपना बो रहे हैं कि
एक दिन पूरी दुनिया इस्लामिक राज्य के अधीन होगी।
इस विचारधारा में दो प्रमुख अवधारणाएँ बार-बार उभरती हैं —
- शरिया कानून की स्थापना,
- ग़ज़वा-ए-हिन्द जैसी आक्रामक परिकल्पनाएँ।
इसके ऊपर ईशनिंदा कानून जैसे प्रावधान
मानवता की वैचारिक स्वतंत्रता को दबाते हैं,
जो स्वाभाविक मानव मूल्यों का हनन है।
इन विचारों का परिणाम ही घृणा, आतंक और रक्तपात के रूप में सामने आता है।
जिसके परिणाम स्वरूप ये बच्चे आगे चलकर ओसामा बिन लादेन या अफज़ल गुरु जैसे अलगाववादी नेताओं का रूप ले लेते हैं।
🎧 क्या वास्तव में मुहम्मद साहब एक रसूल थे?
इस्लाम से संबंधित ऐसे वीभत्स दृष्टांत जब हमारे सामने आते हैं,
तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है —
क्या वास्तव में मुहम्मद साहब एक रसूल थे?
यदि हम इस प्रश्न का उत्तर खोजना चाहते हैं,
तो इसके लिए हमें पहले ‘धर्म’ का वास्तविक अर्थ समझना होगा।
मेरा अनुभव है कि धर्म किसी मत या पंथ का नाम नहीं है,
बल्कि मानवता की मूल आत्मा है,
जो मनुष्य को परोपकार के लिए प्रेरित करती है।
हर भाषा में धर्म को समान भाव के साथ, अलग नामों से पुकारा गया है —
- संस्कृत में — धर्म,
- अरबी में — दीन,
- पाली में — धम्म,
- अंग्रेज़ी में — Religion।
मेरा मानना है कि धर्म मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप तक पहुँचाने का विज्ञान है।
मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हिन्दू दर्शन में आत्मज्ञान कहलाता है,
और इस्लाम में उसे इल्हाम कहा गया है।
धर्म वह है जो हमे स्वयं से जुड़ना सिखाता है, न कि दूसरों से अलगाव रखना।
धर्म वह है जो हमे आत्मा की वास्तविकता का बोध कराता है, ना कि किसी का अंधा अनुकरण करना सिखाता है।
🎧 रसूलों की पहचान
प्रत्येक धर्म तब प्रारंभ हुआ जब किसी व्यक्ति ने स्वयं को जाना।
जिसने स्वयं को जाना, वही मानवता के लिए मार्गदर्शक बना।
जिन्होंने आत्मज्ञान प्राप्त किया, उन्होंने ही धर्म की स्थापना की —
चाहे वे मुहम्मद साहब, ईसा मसीह, गौतम बुद्ध, महावीर या गुरुनानक देव जी हों।या कोई अन्य
उन सभी का उद्देश्य एक ही था —
मानवता, प्रेम और करुणा, जो अंततः उनके भीतर परोपकार के रूप में प्रकट हुआ।जिसे उन्होंने धर्म की संस्थापना के रूप में पूरा किया और लोगो को परम सत्य से अवगत कराने का प्रयास किया
मेरा अनुभव यह है कि शरिया और जज़िया जैसे विचार
किसी धार्मिक व्यक्ति की पवित्र नीयत और परोपकारी भावना का प्रतिनिधित्व नहीं करते।
यदि सभी धर्म मानवता और प्रेम की शिक्षा देते हैं,
तो फिर इस्लाम को मानने वाले लोग कट्टरता और हिंसा की ओर क्यों बढ़ते हैं?
इस विषय पर मेरा मानना है कि धर्म की मूल आत्मा को समझा ही नहीं गया।
मुहम्मद साहब की शिक्षाओं को उनके मूल अर्थ में न समझकर,
लोगों ने उन्हें केवल सतही स्तर पर ही अपनाया।
इसे हम आगे ईमान शब्द के माध्यम से और स्पष्ट रूप से समझेंगे।
यद्यपि मुहम्मद साहब का मूल संदेश शांति, करुणा और न्याय की ओर इंगित करता है,
परंतु समय के साथ उनकी शिक्षाओं को अलगाव पूर्ण कट्टरवादी रूप दे दिया गया।
धर्म की सही जानकारी के अभाव में,
राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों ने इस्लाम मानने वालों को धर्म से विमुख कर दिया।
🎧 रसूलों की पहचान और ईमान का अर्थ
यदि हमें जानना है कि कोई व्यक्ति वास्तव में रसूल है या नहीं,
तो हमें उसकी शिक्षाओं को उनके वास्तविक स्वरूप में समझना होगा।
एक रसूल वही होता है जो लोगों को धर्म का सही मार्ग दिखाए,
उनके भीतर पवित्रता अर्थात निर्मलता का संचार करे
और उसमें परोपकार की भावना को जागृत करे।
जैसा कि मुहम्मद साहब ने स्वयं कहा (सहीह बुख़ारी):
“तुम में से कोई भी सच्चा ईमान वाला नहीं हो सकता,
जब तक कि वह अपने भाई के लिए वही न चाहे,
जो वह अपने लिए चाहता है।”
यह वक्तव्य उनकी धार्मिक अनुभूति का सजीव उदाहरण है।
मेरा मानना है कि यदि हम समझने का प्रयास करें कि
मुहम्मद साहब ने लोगों से “ईमान लाने” के लिए क्यों कहा,
तो यह सरलता से स्पष्ट हो जाएगा कि उनका प्रयोजन परोपकार और मानवता ही था,
ना कि कोई राजनीतिक समीकरण बैठना।
अक्सर इस्लामिक चर्चाओं में कहा जाता है कि
“ईमान लाना हर किसी के वश की बात नहीं।”
तब मेरे मन में प्रश्न उठता है —
फिर मुहम्मद साहब ने सभी लोगों से ‘ईमान लाने’ का आह्वान किया ही क्यों?
सही बात यह है कि , ईमान की पूर्णता ही इल्हाम कहलाती है।
ईमान की पूर्ण अवस्था को मुहम्मद साहब ने मुसलमान कहा,
और इसी अवस्था को श्रीकृष्ण ने स्थितप्रज्ञ।
ईमान और प्रज्ञा दोनों ही शब्द — होश, बोध, स्मृति, चेतना (mindfulness) —
अर्थात जागरूकता के समानार्थी हैं।
जिसकी स्वाभाविक अवस्था निस्कम्प (कंपन रहित) है,
जिसके कारण ज्ञानियों ने इसे स्थितप्रज्ञ और मुसलईमान (मुस्लिम) कहा,
जो आज मुसलमान कहलाता है।
🎧 धर्म का मूल संदेश
आज आवश्यकता है कि हम मुहम्मद साहब को धर्म की दृष्टि से समझें,
न कि राजनीति की दृष्टि से।
धर्म की जड़ प्रेम (अलगाव रहित मानसिकता) है,
पाकीज़गी उसकी शाखा है,
और आत्मज्ञान उसका फल —
जो अंततः किसी व्यक्ति के भीतर शांति और आनंद (सत्चिदानंद) के रूप में प्रकट होता है।
आपको ज्ञात होगा कि सभी धर्मों का मूल संदेश भी यही है।
यदि मुहम्मद साहब को इस दृष्टि से देखा जाए,
तो वे केवल एक रसूल ही नहीं,
बल्कि एक धार्मिक क्रांतिकारी, आत्मज्ञानी और परोपकारी मार्गदर्शक के रूप में उभरते हैं,
जिन्होंने मानवता को “इक़रा” का संदेश दिया —
जिसका धार्मिक अर्थ है अवलोकन, साक्षी और ध्यान।
हमें मुहम्मद साहब के इस संदेश को वास्तविक धार्मिक अर्थों में समझना होगा।