मुहम्मद साहब, इकरा और कुरान (एक आध्यात्मिक मंथन)

आपने मेरे पिछले व्याख्यान को इतने प्रेमपूर्वक पढ़ा और आगे जानने की जिज्ञासा की — उसके लिए आभार एवं धन्यवाद।
जिसके माध्यम से आपने जाना कि आत्मज्ञान, आत्मबोध और इल्हाम — मन की एक ही अवस्था को निरूपित करते हैं।

मेरा मानना है कि आत्मज्ञान, जिसे अरबी में इल्हाम कहा जाता है, को प्राप्त करने की एकमात्र विधि धर्म ही है — जिसे मुहम्मद साहब ने ‘दीन’ कहा है।


धर्म और मुहम्मद साहब का दर्शन

यदि हम मुहम्मद साहब के दर्शन पर आधारित इस्लाम में प्रयुक्त शब्दावली का अध्ययन करें और उसे प्रश्नों के कटघरे में खड़ा करें, तो कई रहस्य उजागर होते हैं—

  • धर्म के मार्ग में मुहम्मद साहब ने क्यों कहा कि इस्लाम कबूल करो?
  • क्यों कहा कि इस्लाम ही सबसे मजबूत सहारा है?
  • मुहम्मद साहब ने क्यों कहा कि ईमान लाओ?
  • क्यों कहा कि कुरान पढ़ो?
  • धर्म में सैतान और फरिश्तों का क्या रहस्य है?
  • कियाम और कियामत की वास्तविकता क्या है?
  • जन्नत और 72 हूरों का क्या रहस्य है?
  • कैसे निर्धारित हो कि धर्म के अंतर्गत कौन काफ़िर, ईमान वाला और मुसलमान है?
  • और क्या रहस्य है मुहम्मद साहब के मूल संदेश इकरा का?

कुरान पढ़ने का वास्तविक संदर्भ

जब हम इन विषयों को धर्म के स्तर पर जानने के लिए तैयार होते हैं, तो यह उचित होगा कि हम शुरुआत वहीं से करें जहाँ से मुहम्मद साहब ने लोगों से कहा — कुरान पढ़ो।

सर्वविदित है कि मुहम्मद साहब के समय में कोई लिखित कुरान अस्तित्व में नहीं थी।
एक पुस्तक को ‘कुरान’ के रूप में प्रस्तुत करना मानव सभ्यता में होने वाली दुर्घटनाओं में सबसे बड़ी दुर्घटना है, जिसके परिणाम मानवता के लिए अत्यंत भयावह रहे।

प्रश्न उठेगा कि तो फिर मुहम्मद साहब ने कौन-सी कुरान पढ़ने के लिए लोगों से कहा होगा?


इकरा मुहम्मद साहब का मूल संदेश

आप सभी जानने को आतुर होंगे कि वह कौन-सी कुरान थी, जिसे मुहम्मद साहब ने पढ़ने को कहा।
यह जानने से पहले हमें उनके मूल संदेश इकरा को समझना होगा, जिसका अर्थ है — “पढ़ो।”

इस संदर्भ में हमें यह कथा सुनाई जाती है कि जब मुहम्मद साहब ध्यान में लीन थे, तब एक फरिश्ता जिब्रईल (Gabriel) प्रकट हुए और उन्होंने कहा —

“पढ़ो अपने उस रब के नाम से, जिसने सब कुछ पैदा किया।”

यही वह बिंदु है, जहाँ से इस्लाम को मानने वालों की धार्मिक गुमराही प्रारंभ हुई।
पढ़ने के बजाय बोलने का दौर शुरू हो गया, जिसने मुहम्मद साहब के मूल संदेश इकरा — यानी पढ़ो — को दफन कर दिया।
लोग इल्हाम के मार्ग से विमुख हो गए, जबकि पढ़ना और बोलना दो अलग बातें हैं।


पढ़ना एक कला और अनुभव की प्रक्रिया

पढ़ना एक कला है, जिसे हर कलाकार अपनाता है।
इसके बिना कलाकार होना संभव नहीं।
यहाँ तक कि एक अच्छा तलवारबाज होना भी।

ऑटिज़्म से ग्रसित बच्चों में यही कमी होती है — वे उस स्तर का नहीं पढ़ पाते, जो एक सामान्य बच्चा पढ़ लेता है।
हम और मुहम्मद साहब में अंतर यही है — हम वह नहीं पढ़ पाते जो मुहम्मद, अर्थात एक आत्मज्ञानी पुरुष, पढ़ने में समर्थ होते हैं।

यही कारण है कि मुहम्मद साहब सहित सभी आत्मज्ञानी महापुरुषों ने धर्म के मार्ग से विपरीत चलने वालों को अंधा और बहरा कहा है।


पढ़ना डिग्री नहीं, अनुभव की साधना

यह पढ़ना किसी डिग्री प्राप्त करने की शिक्षा नहीं है।
यह किसी व्यक्ति का निजी अनुभव है, जिसमें उसकी ग्यारह इन्द्रियों के अनुभव शामिल होते हैं।

वह चीजों को —
आँखों से देखकर,
कानों से सुनकर,
नाक से सूँघकर,
जीभ से चखकर,
त्वचा से छूकर,
और मन से समझकर —
अपने भीतर समाहित करता रहता है,
और समय आने पर उनका विवेकपूर्ण उपयोग करता है।

विवेक को ही मुहम्मद साहब ने फरिश्ता कहा है,
जो हमें असत्य से हटाकर सत्य की ओर प्रेरित करता है।


आत्मविकास की कुंजी

पढ़ने से ही मनुष्य का संपूर्ण विकास — भौतिक और आध्यात्मिक — दोनों होता है।
एक शिशु जन्म से ही अपने वातावरण को पढ़ता है —
आवाज़ों, स्पर्श, रोने-हँसने की विभिन्न क्रियाओं को समझता है।

हर आत्मज्ञानी महापुरुष चाहता है कि सभी लोग आत्मज्ञानी बनें और उस सुख का अनुभव करें जिसे वह स्वयं जीता है।

इसी संबंध में मुहम्मद साहब का संदेश इकरा — पढ़ो इल्हाम की चाबी है,
जिसे हिंदू धर्म में साक्षीभाव, ध्यान या अवलोकन कहा गया है।


प्रकृति ईश्वर की खुली निशानी

कुरान पुस्तक में मुहम्मद साहब के वचन हैं  —
तुम पृथ्वी और आकाश की निशानियों पर विचार करो; यह अल्लाह की खुली आयतें हैं।
(कुरान — सूरह आल-इमरान 3:190-191)
अर्थात — “प्रकृति को देखो, यह अल्लाह की खुली निशानियाँ हैं।”

यह उनके गहन अवलोकन का परिणाम था।
सरल शब्दों में कहें तो — पढ़ना ही समस्त रहस्यों से पर्दा उठाता है,
चाहे वह भौतिक विज्ञान के हों या आध्यात्मिक जगत के।


पढ़ने का गूढ़ अर्थ

“पढ़ना” का गूढ़ अर्थ है — देखना और देखकर समझना,
न कि केवल उच्चारण करना।

गुरु–शिष्य और उस्ताद–शागिर्द परंपरा में शिक्षित व्यक्ति यह बात आसानी से समझ सकते हैं।
जब हम किसी वस्तु या घटना को मन रोककर देखते हैं, तो यह प्रक्रिया पढ़ना कहलाती है।


ज्ञान की विविध विधियाँ

एक छोटा-सा मैकेनिक खराब उपकरण को पढ़ता है,
वैज्ञानिक तथ्यों को पढ़ता है,
हकीम नब्ज़ को पढ़ते हैं,
डॉक्टर्स हार्टबीट को पढ़ते हैं,
और आजकल लोग बाज़ार को पढ़ रहे हैं —😊

हकीम लुकमान ने वनस्पति को पढ़ा,
महर्षि कणाद ने कणों को पढ़ा,
और हम अपने तथा दूसरों के हालात को पढ़ने में ही रह गये हैं।

संसार में इल्हाम उसे प्राप्त होता है, जिसने अपने मन को पढ़ा।


आत्मपठन और आत्मज्ञान

कबीर कहते हैं —

“माला फेरत जुग भया, गया न मन का फेर।
मन का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥”

मन को पढ़ने की इसी प्रक्रिया को महात्मा बुद्ध ने विपश्यना कहा —
अर्थात ठहर कर देखना, शांत भाव से देखना।

यही इकरा है — मुहम्मद साहब का मूल संदेश।
जो अपने मन को तटस्थ भाव से देखना सीख लेता है,
वह संसार की आसक्ति से मुक्त हो जाता है और  जीवन के सत्य को जानने की ओर अग्रसर होता है।


आत्मज्ञान और ईश्वरीय तत्व

आत्मज्ञान को आत्मज्ञानी महापुरुषों ने अल्लाह या ईश्वर के रूप में अभिव्यक्त किया है।
इस्लाम की मान्यताओं में जब कहा जाता है —

“करने वाला अल्लाह है, उसकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता,”
ऐसा अनुभव किसी व्यकित को  इल्हाम होने की परमावस्था का सूचक है।

किसी व्यक्ति का ऐसा भाव हिंदू धर्म में  स्वीकार भाव, या समर्पण भाव, कहा गया है। जो किसी व्यक्ति की  निष्काम कर्म या अकर्ताभाव को निरुपित करता है जिससे व्यक्ति निर्भरता उमंग और अहोभाव को जीता है जिसके लिए इस्लाम में शुकराने भेजने की मान्यता है।    

इस्लाम का अर्थ और रहस्य

इसी कारण इस्लाम को शांति और समर्पण का अर्थ दे दिया गया,
जबकि ये इस्लाम अपनाने का ही अंतिम परिणाम हैं।

प्रश्न उठेगा — फिर इस्लाम क्या है?
मुहम्मद साहब ने किसे इस्लाम कहा?
इस्लाम का वास्तविक अर्थ क्या है?

हम विषय से न भटकें, इसलिए इस रहस्य का उद्घाटन हम आगे करेंगे और अभी अपने मूल विषय पर आगे बढ़ते हैं।

कुरान कौन-सी है असली?

अब प्रश्न उठता है — असली कुरान कौन-सी है, जिसे मुहम्मद साहब ने पढ़ने के लिए कहा?

ईश्वरीय तत्व को जानने के लिए इल्हाम अर्थात आत्मज्ञान एक मध्य बिंदु है।
आत्मज्ञान के बिना ईश्वरीय तत्व को नहीं जाना जा सकता।
हिंदू धर्म में इसे आत्मज्ञान और इस्लाम में इल्हाम  कहा गया है।

स्वयं को जानने की विधि

आत्मज्ञान का अर्थ है — स्वयं को जानना।
अब प्रश्न है — स्वयं को जानने का उपाय क्या है?

क्या दर्पण में देखकर कहना — “यह मैं हूँ” — पर्याप्त है?
नहीं।
स्वयं को जानने के लिए अपने आप को पढ़ना होगा —
जहाँ आप नहीं हैं, वह स्वतः छूट जाएगा,
जहाँ आप हैं, वहाँ आप प्रवाहित होंगे।

इसे हिंदू धर्म में नेति–नेति कहा गया है।

श्वास और कुरान का रहस्य

जब कोई आत्मज्ञान प्राप्त करता है, तो वह इस यात्रा को छोटा करना चाहता है।
वह इसे श्वास के दोहराव से आरंभ करता है।
महात्मा बुद्ध ने आनापान मार्ग सुझाया,
जिसमें साधक श्वास के आने–जाने का अवलोकन करता है।

इसी प्रकार मुहम्मद साहब ने भी कहा — कुरान पढ़ो।
कुरान का शाब्दिक अर्थ है — दोहराव या पुनरावृत्ति,
जो श्वास की प्रक्रिया से संबंधित है।

वज़ू, प्राणायाम और तंत्र परंपरा

हर नमाज़ से पहले वज़ू किया जाता है हाथ, पैर, नाक और गला साफ किया जाता है,
जिसमें नाक को साफ करने पर विशेष बल दिया जाता है,
जो श्वास को सहज बनाने की तैयारी की ओर संकेत करता है।

महर्षि पतंजलि ने इसी श्वास प्रक्रिया को प्राणायाम कहा है।
प्राणायाम को उन्होंने अष्टांग योग मार्ग में विशेष स्थान दिया जिसे उन्होंने समाधि से जोड़ा।

हिंदू धर्म के तंत्र सूत्रों में शिव ने आत्मज्ञान के लिए 112 विधियाँ बताईं,
जिनमें 9 विधियाँ श्वास आधारित हैं —
समस्त ११२ विधियों को आचार्य रजनीश (ओशो) ने अपने आत्मज्ञान के अनुभवों के साथ अत्यंत सरल भाषा में समझाया।

भगवान श्रीकृष्ण ने इसी प्रक्रिया को यज्ञ कहा है,
जहाँ श्वास को नाभिकुंड में आहूत किया जाता है — इसे उन्होंने ज्ञान यज्ञ कहा।

उनके अनुसार —

“द्रव्य यज्ञ से ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है।” यहाँ यह बात भी ध्यान लेने योग्य है कि श्री कृष्ण की  मूल शिक्षा आत्मज्ञान ही है जिसे उन्होंने अर्जुन के माध्यम से पूरी मनुष्यता को दी

महत्मा बुद्ध ने आत्मज्ञान के लिए श्वास आने और जाने यानी की दोहराव प्रक्रिया को आनापान के रूप में लोगो को सुझाया  

हिंदू धर्म में सोऽहं साधना भी श्वास पर आधारित विधि है।
ये सभी विधियाँ मन को विशुद्ध बनाती हैं,
जिससे व्यक्ति सत्चित्आनंद की अवस्था में प्रवेश करता है।

निष्कर्ष

इसीलिए मैंने कहा कि —
एक पुस्तक को कुरान के रूप में प्रस्तुत करना ही मानव सभ्यता की सबसे बड़ी दुर्घटना है।

यह पुस्तक के नामकरण में हुई भूल है,
जिसके कारण लोग एक किताब को ही कुरान मानकर पढ़ रहे हैं।

इसलिए मैं कहता हूँ —

“लोगों का एक किताब को ‘कुरान’ बतलाना,
असल में मुहम्मद साहब के असली संदेश से भटक जाना है।”

समापन                       

इस भूल के बाद से ही इस्लामिक समाज कुरान की विशेषताओं को सिद्ध करने की कोशिश में लगा है —

  1. कुरान सबसे अच्छी दवा है।
  2. कुरान अल्लाह का कलाम है।
  3. कुरान पवित्र और अपरिवर्तनीय है।

ये सभी बातें संकेत करती हैं कि मुहम्मद साहब ने श्वास के आने और जाने को ही कुरान कहा —
जिसे उन्होंने इकरा यानी पढ़ने से जोड़ा जिसके धर्म प्रेरित गूढ़ अर्थ को हमने समझा। 

इन सब बातों का मैंने अपनी पुस्तकों में विस्तार से वर्णन किया है।
आप मेरे सभी विचार मेरी वेबसाइट पर स्वतंत्र रूप से पढ़ सकते हैं।

आज ही पढ़े पुस्तक “इस्लाम समाधान या समस्या”

धन्यवाद।

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